1. हमें अपना कर्तव्य करना चाहिए , दूसरों के मलिन कर्मों के विचारने से भी चित्त पर मलिन छाया पड़ती है. -- जय शंकर प्रसाद
2. कर्तव्य कोई ऎसी वस्तु नहीं है जिसको नाप-जोख कर देखा जाय. -- शरत चंद्र
3. कर्तव्य का पालन ही चित्त की शांति का मूल-मन्त्र है. -- प्रेमचंद
4. कुछ न कुछ कर बैठना ही कर्तव्य नहीं कहा जा सकता. कोई समय ऐसा भी होता है, जब कुछ न करना ही सबसे बड़ा कर्तव्य माना जाता है. -- रवींद्र नाथ ठाकुर
5. कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता. -- प्रेमचंद
6. ईश्वर शांति चाहता है और उसकी इच्छानुसार चलना ही मानव का परम कर्तव्य है. -- टालस्टाय
7. बहादुर होने के लिए व्यक्ति को अपने कर्तव्य से ज्यादा काम करना होता है. -- रेनॉल्ड्स
8. बुराई से असहयोग करना मानव का पवित्र कर्तव्य है. -- महात्मा गांधी
9. मानव मत तू फिक्र कर , यश-अपयश सम हव्य ;
बल, धीरज, मन, बुद्धि, से करता जा कर्तव्य ॥ -- श्रीमन्नारायण
Wednesday, January 2, 2008
Tuesday, January 1, 2008
क्या आप अच्छे कार्यों का श्रेय दूसरों को देते हैं !
1. प्रशंसा पाने के लिए व्यक्ति क्या-क्या नहीं करता है. हर अच्छे काम का श्रेय स्वयं ही लेना चाहता है. इससे जान-अनजाने इन छोटी-छोटी बातों से हममें अभिमान की भावना पनपने लगती है.
2. इसी अभिमान-वश हमसे कई बार ऎसी गलतियाँ भी हो जातीं हैं, जिन पर ठंडे दिमाग से सोचने पर हमें ग्लानि का अहसास होने लगता है.
3. कई बार श्रेय लेने की होड़ में हम सही गलत का भेद भी भूल जाते हैं.
4. ऎसी भावना से मुक्त होने का सरलतम मार्ग है कि हम अपने समस्त कार्यों का श्रेय ईश्वर को सौंप दें. इससे न तो हममें अभिमान का भाव पैदा होगा और न ही अपने कार्यों के प्रति किसी प्रकार की आसक्ति ही होगी.
5. यदि कभी आप अपने द्वारा किये गए कार्य का श्रेय किसी दूसरे को देकर देखें , एक अदभुत सी ख़ुशी और आत्मिक संतोष महसूस होता है.
6. ऐसा करके आप जिसे श्रेय देंगे उसकी नज़रों में आपकी इज़्ज़त कितनी बढ़ जायेगी इस प्रकार आप उसका दिल जीत सकते हैं. अपने आप को विनम्र और सहिष्णु बनाने का यह सर्व-श्रेष्ठ तरीका है.
7. इससे आपमें संतोष की भावना सुदृढ़ होगी. आप सही मायनों में अपने जीवन से सन्तुष्ट होंगे.
2. इसी अभिमान-वश हमसे कई बार ऎसी गलतियाँ भी हो जातीं हैं, जिन पर ठंडे दिमाग से सोचने पर हमें ग्लानि का अहसास होने लगता है.
3. कई बार श्रेय लेने की होड़ में हम सही गलत का भेद भी भूल जाते हैं.
4. ऎसी भावना से मुक्त होने का सरलतम मार्ग है कि हम अपने समस्त कार्यों का श्रेय ईश्वर को सौंप दें. इससे न तो हममें अभिमान का भाव पैदा होगा और न ही अपने कार्यों के प्रति किसी प्रकार की आसक्ति ही होगी.
5. यदि कभी आप अपने द्वारा किये गए कार्य का श्रेय किसी दूसरे को देकर देखें , एक अदभुत सी ख़ुशी और आत्मिक संतोष महसूस होता है.
6. ऐसा करके आप जिसे श्रेय देंगे उसकी नज़रों में आपकी इज़्ज़त कितनी बढ़ जायेगी इस प्रकार आप उसका दिल जीत सकते हैं. अपने आप को विनम्र और सहिष्णु बनाने का यह सर्व-श्रेष्ठ तरीका है.
7. इससे आपमें संतोष की भावना सुदृढ़ होगी. आप सही मायनों में अपने जीवन से सन्तुष्ट होंगे.
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